व्यतिरेकी भाषाविज्ञान

व्यतिरेकी भाषाविज्ञान (Contrastive linguistics) भाषा-शिक्षण का व्यवहारिक तरीका है जो किसी भाषा-युग्म के समानताओं एवं अन्तरों का वर्णन करके भाषा को सुगम बनाने पर जोर देता है। इसीलिये इसे कभी-कभी अंतरात्मक भाषाविज्ञान (differential linguistics) भी कहा जाता है।

इतिहास

व्यतिरेकी भाषाविज्ञान का उदय द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सैनिकों को उन देशों की भाषाएँ, जहाँ वे लड़ने जा रहे थे, सिखाने के उद्देश्य से हुआ। भाषाविज्ञानियों से कहा गया था कि वे वहाँ की भाषाओं को कम से कम समय में सीखने व सिखाने के लिए शिक्षण-सामग्री तैयार कर उपलब्ध कर दें। इसी अवधि में अमरीका में कई जातियों के और की भाषाओं को बोलने वाले लोग आकर बसने लगे थे। उन सब लोगों को अंग्रेजी सीखने और सिखाने की भी माँग आ गयी थी। इन दोनों माँगों की पूर्ति में भाषाविज्ञानियों को कई भिन्न-भिन्न भाषाओं के अध्ययन और विश्लेषण के साथ-साथ उनकी शिक्षण-सामग्री का निर्माण करना पड़ा। इसके परिणामस्वरुप स्कूलों के पाठ्यक्रमों की शिक्षण-सामग्री को भी नये सिरे से निर्मित करने का विचार उठा। इन सबके परिप्रेक्ष्य में `भाषाशिक्षण में भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग पक्ष' पर जोरों से काम होने लगा। अन्य-भाषा शिक्षण की बढ़ती माँग ने ही व्यतिरेकी भाषाविज्ञान को जन्म दिया है।

व्यतिरेकी भाषाविज्ञान का इतिहास बहुत ही अल्प समय का है, केवल पच्चीस-तीस वर्ष का। व्यतिरेकी भाषाविज्ञान को एक व्यवस्थित शाखा के रूप में विकसित कराने का श्रेय दो अमरीकी भाषाविज्ञानियों को जाता है। वे हैं - चार्ल्स सी फ्रीज़ और राबर्ट लेडो। सन् १९५७ में प्रकाशित राबर्ट लेडो की पुस्तक `लिंग्विस्टिक्स एक्रासक कल्चर्स' व्यतिरेकी भाषाविज्ञान का आकार ग्रन्थ है। इन्हीं दिनों अन्य भाषाओं को सिखाते हुए भाषाविज्ञानियों ने महसूस किया कि अन्य भाषा सीखने वाला कुछ ऐसी भाषा बोलता या लिखता है जो सीखी जाने वाली भाषा के अनुरुप नहीं होती। इसके दो कारण हो सकते हैं :

(१) या तो उसने उस भाषा के नियमों को गलत तरीके से सीखा है और

(२) या अभी उसने उन नियमों पर दक्षता हासिल नहीं की है।

इन धारणाओं ने तीन विचारों को जन्म दिया--

(क) यदि अन्य भाषा शिक्षण को सही दिशा में और वैज्ञानिक तरीकों से संपन्न कराया जाए तो सीखने वाला उस भाषा के नियमों के अनुरुप भाषा का प्रयोग कर सकता है।

(ख) अन्य भाषा में सीखने वालों की जो त्रुटियाँ होती हैं, वे इस बात को संकेतित करती हैं कि सीखने वाले को कुछ स्थलों में कठिनाइयाँ होती हैं। इन्हें कठिनाइयों के स्थल या समस्यामूलक स्थल कह सकते हैं।

(ग) कठिनाइयों के स्थल प्राय: वे ही होते हैं जो सीखने वाले की मातृभाषा (स्त्रोत भाषा) और सिखायी जाने वाली भाषा (लक्ष्य भाषा) की संरचना में अंतर या भिन्नता के स्थल हैं।

उपर्युक्त विचारों से व्यतिरेकी भाषाविज्ञान की स्थापनाओं को बल मिला।